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गुरुवार, 13 दिसंबर 2018

वीर कुंवर सिंह का इतिहास | Veer Kunwar Singh History in Hindi



हेल्लो दोस्तों, मै आपका दोस्त आज आपको एक ऐसे स्वतन्त्रता सेनानी के बारे में बताऊंगा जिन्होंने अस्सी साल के उम्र में भी अंग्रेजो के दांत खट्टे कर दिए थे।इक महान युध्दा जिसने अंग्रेज़ो के साथ अनेकों लड़ाइयां किया। उनका नाम था बाबू कुंवर सिंह।

वीर कुंवर सिंह का इतिहास | Veer Kunwar Singh History in Hindi

वीर कुंवर सिंह का इतिहास | Veer Kunwar Singh History in Hindi






बाबू कुंवर सिंह (1777 - 1857) सन 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सिपाही और महानायक थे।अन्याय विरोधी व स्वतंत्रता प्रेमी बाबू कुंवर सिंह कुशल सेना नायक थे। इनको 80 वर्ष की उम्र में भी लड़ने तथा विजय हासिल करने के लिए जाना जाता है।
वीर कुंवर सिंह का जन्म 23 अप्रैल 1777 को बिहार के भोजपुर जिले के जगदीशपुर गांव में हुआ था। इनके पिता बाबू साहबजादा सिंह प्रसिद्ध शासक भोज के वंशजों में से थे। उनके छोटे भाई अमर सिंह, दयालु सिंह और राजपति सिंह एवं इसी खानदान के बाबू उदवंत सिंह, उमराव सिंह तथा गजराज सिंह नामी जागीरदार रहे तथा अपनी आजादी कायम रखने के खातिर सदा लड़ते रहे।
1857 में अंग्रेजों को भारत से भगाने के लिए हिंदू और मुसलमानों ने मिलकर कदम बढ़ाया। मंगल पांडे की बहादुरी ने सारे देश में विप्लव मचा दिया।


बिहार की दानापुर रेजिमेंट, बंगाल के बैरकपुर और रामगढ़ के सिपाहियों ने बगावत कर दी। मेरठ, कानपुर, लखनऊ, इलाहाबाद, झांसी और दिल्ली में भी आग भड़क उठी। ऐसे हालात में बाबू कुंवर सिंह ने भारतीय सैनिकों का नेतृत्व किया।इतिहासकारों ने लिखा है कि सनं् 1857 के विद्रोही नेताओं में युद्ध विद्या की कला की योग्यता रखने वाले कुंवर सिंह से बढ़कर कोई नेता नहीं था। अल्प-साधन, अल्प-संगठन, अल्प सैन्य कला और धनाभाव में भी इन्होंने अवरोधों व विरोधियों के होते हुए भी अपने को सुरक्षित रखा। पचहत्तर साल की अवस्था में उन्होंने जो स्फूर्ति जन्य कार्यो का प्रदर्शन किया, उसका लोहा अंग्रेज भी मानते थे।27 अप्रैल 1857 को दानापुर के सिपाहियों, भोजपुरी जवानों और अन्य साथियों के साथ आरा नगर पर बाबू वीर कुंवर सिंह ने कब्जा कर लिया। अंग्रेजों की लाख कोशिशों के बाद भी भोजपुर लंबे समय तक स्वतंत्र रहा। जब अंग्रेजी फौज ने आरा पर हमला करने की कोशिश की तो बीबीगंज और बिहिया के जंगलों में घमासान लड़ाई हुई। बहादुर स्वतंत्रता सेनानी जगदीशपुर की ओर बढ़ गए। आरा पर फिर से कब्जा जमाने के बाद अंग्रेजों ने जगदीशपुर पर आक्रमण कर दिया। बाबू कुंवर सिंह और अमर सिंह को जन्म भूमि छोड़नी पड़ी। अमर सिंह अंग्रेजों से छापामार लड़ाई लड़ते रहे और बाबू कुंवर सिंह रामगढ़ के बहादुर सिपाहियों के साथ बांदा, रीवां, आजमगढ़, बनारस, बलिया, गाजीपुर एवं गोरखपुर में विप्लव के नगाड़े बजाते रहे। ब्रिटिश इतिहासकार होम्स ने उनके बारे में लिखा है, 'उस बूढ़े राजपूत ने ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध अद्भुत वीरता और आन-बान के साथ लड़ाई लड़ी। यह गनीमत थी कि युद्ध के समय कुंवर सिंह की उम्र अस्सी के करीब थी।

अगर वह जवान होते तो शायद अंग्रेजों को 1857 में ही भारत छोड़ना पड़ता।अजायब महतो' में लिखा है कि सन् 20 अप्रैल 1858 को आजमगढ़ पर कब्जे के बाद रात में वे बलिया के मनियर गांव पहुंचे। 22 अप्रैल को सूर्योदय की बेला में शिवपुर घाट बलिया से एक हाथी पर सवार हो गंगा पार करने लगे। उसी दरम्यान फिरंगियों ने उनपर तोप के गोले दागे। इसमें बाबू कुंवर सिंह की दाहिनी कलाई कटकर लटक गयी। तब उन्होंने यह कहते हुए कि 'लो गंगा माई! तेरी यही इच्छा है तो' स्वयं बायें हाथ से तलवार उठाकर उस झूलती हथेली को काट गंगा में प्रवाहित कर दिया। हालांकि, इसके गहरे जख्म को वे सहन नहीं कर सके और अगले ही दिन वैद्य के तमाम प्रयासों के बावजूद वे शहीद हो गये।इन्होंने 23 अप्रैल 1858 में, जगदीशपुर के पास अंतिम लड़ाई लड़ी। ईस्ट इंडिया कंपनी के भाड़े के सैनिकों को इन्होंने पूरी तरह खदेड़ दिया। उस दिन बुरी तरह घायल होने पर भी इस रणबाँकुरे ने जगदीशपुर किले से गोरे पिस्सुओं का "यूनियन जैक" नाम का झंडा उतार कर ही दम लिया। वहाँ से अपने किले में लौटने के बाद 26 अप्रैल 1858 को इन्होंने वीरगति पाई।

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