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शुक्रवार, 7 दिसंबर 2018

महाराजा महाराणा प्रताप सिंह---दृढप्रतिज्ञ और सच्चा देश भक्त। जानिए राणा जी के बारे में


महाराजा महाराणा प्रताप सिंह---दृढप्रतिज्ञ और  सच्चा देश भक्त। जानिए राणा जी के बारे में
महाराजा महाराणा प्रताप सिंह---दृढप्रतिज्ञ और  सच्चा देश भक्त। जानिए राणा जी के बारे में



नमस्ते दोस्तो मै जीउत राय आज फिर से आप सभी के लिए एक नया प्रेरणादायक कहानी आप सभी दोस्तो के लिए लाया हूं आज मै आप सबको हिन्दुओं के आन बान शान और हमारे मार्गदर्शक सुरबिर महाराजा महाराणा प्रताप सिंह  जी के जीवनी पर कुछ लिखने जा रहा हूं अगर कुछ गलती मुझसे हो जाए तो माफ़ करना।तो चलिए शुरू करते है तो भाईयो मेवाड़ के सिसोदिया वंस में जन्मे महाराणा प्रताप जी का जन्म 9 may 1540 मेवाड़ में हुआ था।उनके पिता महराजा उदय सिंह जी और माता जैवंता बई थी। उनके पहली पत्नि  का नाम महारानी अजबदे था। महाराणा प्रताप सिंह जी 11 सादिया किए थे। महारानी अजब्दे के कोख से दो बेटा थे जिनका नाम अमर सिंह और भगवान दास था।उनके बड़े भाई का नाम शक्ति सिंह,विक्रम सिंह,और जगमाल सिंह था। उनका दो बहन भी है जिनका नाम चंद कंवर और मन कंवर था। महाराणा प्रताप सिंह जी को बचपन में किका के नाम से पुकारा जाता था। राणा उदय सिंह के देहांत होने के बाद उनके दूसरी रानी धिरबई जिसे इतिहास में भटियाणी कहा जाता है वह अपने पुत्र जगमाल को मेवाड़ का उतराधिकारी बनाना चाहती थी ।लेकिन राज्य के जनता महाराणा प्रताप सिंह जी को मेवाड़ के राजा के रूप में देखना चाहती थी फलस्वरूप जगमाल सिंह अकबर से जा मिले थे। महाराणा प्रताप सिंह जी की राज्याभिषेक 28 Feb 1572 , कुंभल गढ़ में हुआ। महाराणा प्रताप सिंह जी के शासन काल में सबसे रोचक तथ्य ये था कि अकबर उनको बिना किसी वार के उनको अपने अधीन लना चाहता था। राणा को मनाने के लिए अकबर ने चार राजदूत भेजा था पहला राजदूत सितंबर 1572 में जलाल खान , दूसरा 1573 में मानसिंह, तीसरा सितम्बर 1573 में भगवान दास तथा राजा टोडरमल दिसंबर 1573 में महाराणा प्रताप सिंह जी को मनाने के लिए आए थे। लेकिन चारो को निराशा ही हाथ लगी।इस तरह राणा जी ने मुगलों का अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिए और हमे हल्दीघाटी का ऐतिहासिक युद्ध देखने को मिला। उन्होंने कई सालो तक मुगल शासक के साथ संघर्ष किए और कई बार मुगलों को हराया भी।






हल्दीघाटी युद्ध के संदर्भ में--

यह युद्ध 18 जून 1576 ईसवी में मेवाड़ तथा मुगलों के मध्य हुआ था। इस युद्ध में मेवाड़ की सेना का नेतृत्व महाराणा प्रताप सिंह जी ने किया था।इस युद्ध में मेवाड़ के तरफ से एक मात्र मुस्लिम सरदार थे - हकीम खां सूरी।
इस युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व मानसिंह तथा आसफ खां ने किया था।
इस युद्ध में बिंदा के झालामान ने अपने प्राण देकर महाराणा प्रताप की जीवन की रक्षा की।इस युद्ध में ग्वालियर नरेस राजा रमासह तोमर भी अपने तीन पुत्र तथा सैकड़ों सैनिकों के साथ हमेशा के लिए गहरे नींद में सो गए।सभी मानते है कि इस युद्ध में किसी के भी जीत नहीं हुआ लेकिन मेरा मानना है इस युद्ध में महाराणा प्रताप सिंह जी का जीत हुआ था क्युकी अकबर के विशाल सेना के सामने मेवाड़ की  मुट्ठी भर सेना क्या करती पर ऐसा कुछ नहीं हुआ और ये युद्ध पूरे एक दिन तक चला । इस युद्ध में राजपूतों ने मुगलों की छके छुड़ा दिए।मुगल सेना भागने पर मजबूर हो गई थी। हल्दीघाटी युद्ध में 20000 राजपूतों को साथ लेकर राणा प्रताप ने मुगल सरदार राजा मानसिंह के 80000 की सेना का सामना किया। शत्रु सेना से घिर चुके महाराणा प्रताप को झाला मानसिंह ने आपने प्राण दे कर बचाया ओर महाराणा को युद्ध भूमि छोड़ने के लिए बोला। शक्ति सिंह ने आपना अश्व दे कर महाराणा को बचाया। प्रिय अश्व चेतक की भी मृत्यु हुई। यह युद्ध तो केवल एक दिन चला परन्तु इसमें 70000 लोग मारे गए। मेवाड़ को जीतने के लिये अकबर ने सभी प्रयास किये। महाराणा की हालत दिन-प्रतिदिन चिंताजनक होती चली गई । 25000 राजपूतों को 12  साल तक चले उतना अनुदान देकर भामाशाह भी अमर हुआ।




देवर का युद्ध--

राजस्थान के इतिहास में 1582 में दीवर का युद्ध महत्वपूर्ण मना जाता है इस लिए की इस युद्ध के बाद महाराणा प्रताप सिंह के खोए हुए राज्य का फिर से प्राप्ति हुई। ये युद्ध लंबा समय तक चला जिसके कारण कर्नल जेम्स टॉड ने इस युद्ध को मेवाड़ का मैराथन कहा।

महाराणा प्रताप सिंह के डर से अकबर अपनी राजधानी लाहौर लेकर चला गया और महाराणा के स्वर्ग सीधरने के बाद अागरा ले आया।

'एक सच्चे राजपूत, शूरवीर, देशभक्त, योद्धा, मातृभूमि के रखवाले के रूप में महाराणा प्रताप दुनिया में सदैव के लिए अमर हो गए।

महाराणा प्रताप का सबसे बड़ा शत्रु अकबर था, पर उनकी यह लड़ाई कोई व्यक्तिगत द्वेष का परिणाम नहीं थी, हालांकि अपने सिद्धांतों और मूल्यों की लड़ाई थी। एक वह था जो अपने क्रूर साम्राज्य का विस्तार करना चाहता था , जब की एक तरफ ये थे जो अपनी भारत मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए संघर्ष कर रहे थे। महाराणा प्रताप की मृत्यु पर अकबर को बहुत ही दुःख हुआ क्योंकि ह्रदय से वो महाराणा प्रताप के गुणों का प्रशंसक था और अकबर जनता था की महाराणा जैसा वीर कोई नहीं है इस धरती पर। यह समाचार सुन अकबर रहस्यमय तरीके से मौन हो गया और उसकी आँख में आंसू आ गए।

महाराणा प्रताप सिंह जी 19 जनवरी 1597 को देहांत हो गया




महाराणा प्रताप के स्वर्गावसान के समय अकबर लाहौर में था और वहीं उसे सूचना मिली कि महाराणा प्रताप की मृत्यु हो गई है। अकबर की उस समय की मनोदशा पर अकबर के दरबारी दुरसा आढ़ा ने  जो विवरण लिखा वो कुछ इस तरह है:-


हे गेहलोत राणा प्रतापसिंघ तेरी मृत्यु पर शाह यानि सम्राट ने दांतों के बीच जीभ दबाई और निश्वास के साथ आंसू टपकाए। क्योंकि तूने कभी भी अपने घोड़ों पर मुगलिया दाग नहीं लगने दिया। तूने अपनी पगड़ी को किसी के आगे झुकाया नहीं, हालांकि तू अपना आडा यानि यश या राज्य तो गंवा गया लेकिन फिर भी तू अपने राज्य के धुरे को बांए कंधे से ही चलाता रहा। तेरी रानियां कभी नवरोजों में नहीं गईं और ना ही तू खुद आसतों यानि बादशाही डेरों में गया। तू कभी शाही झरोखे के नीचे नहीं खड़ा रहा और तेरा रौब दुनिया पर निरंतर बना रहा। इसलिए मैं कहता हूं कि तू सब तरह से जीत गया और बादशाह हार गया।



अपनी मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए अपना पूरा जीवन का बलिदान कर देने वाले ऐसे वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप और उनके स्वामिभक्त अश्व चेतक को शत-शत कोटि-कोटि प्रणाम।


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