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बुधवार, 19 दिसंबर 2018

सुब्रमण्यम भारती के जीवनी

सुब्रमण्यम भारती के जीवनी
सुब्रमण्यम भारती के जीवनी


सुब्रमण्यम भारती एक तमिल कवि थे, जिन्हें 'महाकवि भरतियार' के नाम से भी जाना जाता है. देशप्रेम की भावना से ओत-प्रोत कविताएं लिखने वाले भारती कवि के साथ-साथ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी, समाज सुधारक, पत्रकार भी थे.भारती की रचनाओं से प्रभावित होकर दक्षिण भारत में बड़ी संख्या में लोग आजादी की लड़ाई में शामिल हुए थे.

उन्होंने अपनी पुस्तक गीतांजलि, जन्मभूमि और पांचाली सप्तम में आधुनिक तमिल शैली का इस्तेमाल किया, जिससे उनकी भाषा जनसाधारण के लिए आसान हो गई. भारती कई भाषाओं के जानकार थे. उनकी पकड़ हिन्दी, बंगाली, संस्कृत और अंग्रेजी सहित कई भारतीय भाषाओं पर थी पर तमिल उनके लिए सबसे प्रिय और मीठी भाषा थी.

भारती का योगदान साहित्य के क्षेत्र में तो महत्वपूर्ण है ही, उन्होंने पत्रकारिता के लिए भी काफी काम और त्याग किया. उन्होंने 'इंडिया', 'विजय' और 'तमिल डेली' का संपादन किया. भारती देश के पहले ऐसे पत्रकार माने जाते हैं जिन्होंने अपने अखबार में प्रहसन और राजनीतिक कार्टूनों को जगह दी.

भारती 1907 की ऐतिहासिक सूरत कांग्रेस में शामिल हुए थे जिसने नरम दल और गरम दल के बीच की तस्वीर स्पष्ट कर दी थी। भारती ने तिलक, अरविन्द तथा अन्य नेताओं के गरम दल का समर्थन किया था। इसके बाद वह पूरी तरह से लेखन और राजनीतिक गतिविधियों में शामिल हो गए।

वर्ष 1908 में इंडिया के मालिक को मद्रास में गिरफ्तार कर लिया गया और उनकी गिरफ्तारी भी की जानी थी। गिरफ्तारी से बचने के लिए वह पांडिचेरी चले गए जो उन दिनों फ्रांसीसी शासन में था। भारती 1918 में ब्रिटिश भारत में लौटे और उन्हें तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें कुछ दिनों तक जेल में रखा गया। बाद के दिनों में उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा और 11 सितंबर 1921 को निधन हो गया।
सुब्रमण्यम भारती 40 साल से भी कम समय तक जीवित रहे और इस अल्पावधि में भी उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में बहुत काम किया और उनकी रचनाओं की लोकप्रियता ने उन्हें हमेशा के लिए अमर बना दिया.बनारस प्रवास की अवधि में उनका हिन्दू अध्यात्म व राष्ट्रप्रेम से साक्षात्कार हुआ। सन् १९०० तक वे भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन में पूरी तरह जुड़ चुके थे और उन्होने पूरे भारत में होने वाली कांग्रेस की सभाओं में भाग लेना आरम्भ कर दिया था। भगिनी निवेदिता, अरविन्द और वंदे मातरम् के गीत ने भारती के भीतर आजादी की भावना को और पल्लवित किया। कांग्रेस के उग्रवादी तबके के करीब होने के कारण पुलिस उन्हें गिरफ्तार करना चाहती थी।
भारती 1906 में पांडिचेरी गए, जहां दस वर्ष वनवासी की तरह बिताए। इसी दौरान उन्होंने कविता और गद्य के जरिये आजादी की बात कही। ‘साप्ताहिक इंडिया’ के द्वारा आजादी की प्राप्ति, जाति भेद को समाप्त करने और राष्ट्रीय जीवन में नारी शक्ति की पहचान के लिए वे जुटे रहे। आजादी के आन्दोलन में 20

नवम्बर 1918को वे जेल गए।

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