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बुधवार, 12 दिसंबर 2018

Khudiram boss biography

Khudiram boss biography
Khudiram boss biography

आजादी की लड़ाई का इतिहास क्रांतिकारियों के त्याग और बलिदान के अनगिनत कारनामों से भरा पड़ा है. क्रांतिकारियों की सूची में ऐसा ही एक नाम है खुदीराम बोस का, जो शहादत के बाद इतने लोकप्रिय हो गए कि नौजवान एक खास किस्म की धोती पहनने लगे, जिनकी किनारी पर खुदीराम लिखा होता था!
भारतीय स्वाधीनता संग्राम की क्रांतिकारी धारा में त्याग और बलिदान का जज्बा पैदा करने और देश में आजादी के लिए जान न्यौछावर करने का साहस भरने वाले प्रथम सेनानी खुदीराम बोस माने जाते हैं.
उनकी शहादत ने हिंदुस्तानियों में आजादी की जो ललक पैदा की, उससे स्वाधीनता आंदोलन को नया बल मिला.
खुदीराम का जन्म तीन दिसंबर 1889 को पश्चिम बंगाल के मिदनापुर में त्रैलोक्यनाथ बोस के घर हुआ था. खुदीराम को आजादी हासिल करने की ऐसी लगन लगी कि नौवीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़कर वह स्वदेशी आंदोलन में कूद पड़े. इसके बाद वह रिवोल्यूशनरी पार्टी के सदस्य बने और वंदेमातरम लिखे पर्चे वितरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. सन् 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में चले आंदोलन में भी उन्होंने बढ़ चढ़ कर भाग लिया. उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों के चलते 28 फरवरी 1906 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन वह कैद से भाग निकले. लगभग दो महीने बाद अप्रैल में वह फिर से पकड़े गए. 16 मई 1906 को उन्हें रिहा कर दिया गया.
06 दिसंबर 1907 को खुदीराम ने नारायणगढ़ रेलवे स्टेशन पर बंगाल के गवर्नर की विशेष ट्रेन पर हमला किया, परंतु गवर्नर बच गया. सन् 1908 में खुदीराम ने दो अंग्रेज अधिकारियों वाट्सन और पैम्फायल्ट फुलर पर बम से हमला किया, लेकिन वे भी बच निकले. खुदीराम बोस मुजफ्फरपुर के सेशन जज किंग्सफोर्ड से बेहद खफा थे, जिसने बंगाल के कई देशभक्तों को कड़ी सजा दी थी. उन्होंने अपने साथी प्रफुल्ल चंद चाकी के साथ मिलकर किंग्सफोर्ड को सबक सिखाने की ठानी. दोनों मुजफ्फरपुर आए और 30 अप्रैल 1908 को सेशन जज की गाड़ी पर बम फेंक दिया, लेकिन उस गाड़ी में उस समय सेशन जज की जगह उसकी परिचित दो यूरोपीय महिलाएं कैनेडी और उसकी बेटी सवार थीं. किंग्सफोर्ड के धोखे में दोनों महिलाएं मारी गईं, जिसका खुदीराम और प्रफुल चंद चाकी को काफी अफसोस हुआ. अंग्रेज पुलिस उनके पीछे लगी और वैनी रेलवे स्टेशन पर उन्हें घेर लिया. अपने को पुलिस से घिरा देख प्रफुल्ल चंद चाकी ने खुद को गोली से उड़ा लिया, जबकि खुदीराम पकड़े गए. मुजफ्फरपुर जेल में 11 अगस्त 1908 को उन्हें फांसी पर लटका दिया गया. उस समय उनकी उम्र सिर्फ 19 साल थी.

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