New Breaking News

Post Top Ad google

Your Ad Spot

रविवार, 9 दिसंबर 2018

पृथ्वराज चौहान की जीवनी। Prithviraj Chauhan biography in Hindi

              
               चार बांस चौबीस गज, अड़गुल अष्ट प्रमाण।
               ता ऊपर सुल्तान है,मत चूको चौहान।।

पृथ्वराज चौहान की जीवनी। Prithviraj Chauhan biography in Hindi
पृथ्वराज चौहान की जीवनी। Prithviraj Chauhan biography in Hindi



नमस्ते दोस्तो, मै आज किसके बारे में बताने जा रहा हूं आप को ऊपर का छंद पड़ कर पाता चल ही गया होगा अगर नहीं पाता तो मै आपको बताऊंगा और ओ भी बहुत ही काम शब्दो  में जी हां मै बात कर रहा हूं हिन्दुओं के अन्तिम शासक पृथ्वी राज चौहान का तो चलिए शुरू करते हैं।

तो पहले बात करेंगे चौहान की बाल्यकाल और परिवार के बारे में --

उनका जन्म  ग्रेगोरियान पंचांग के अनुसार 1 जून 1163 को गुजरात के पाटन पतन में हुआ था।जो कि उस समय गुजरात राज्य का राजधानी था। पृथ्वी राज चौहान के पिता का नाम सोमेश्वर और माता का नाम करपुरिदेवी था। पृथ्वी राज चौहान के छोटे भाई का नाम हरिराज और बहन का नाम पृथा था। पृथ्वीराज चव्हाण की तेरह रानिया थी। पृथ्वीराज चव्हाण का एक पुत्र था जिसका नाम गोविन्द था।


जैसे कि पहले राजा के पुत्रों का नाम उनके राजपुरोहत करते थे तो सोमेश्वर के पुत्र के जन्म के बाद ओ अपने राजपुरोहतों से नामकरण करवाते है और राजपुरोहतों ने बालक का भाग्यफल देख कर उस बालक का नाम “पृथ्वीराज “ रखते है।इसकी उल्लेख पृथ्वीराज रासो काव्य में चंद्रबरदाई लिखते है --

                  यह लहै द्रव्य पर हरै भूमि।
                  सुख लहै अंग जब होई झुमी।।

अर्थात ये बालक महाराजाओं का छत्र अपने बल से हर लेगा और सिंहासन के सोभा को बढ़ाएगा।

चालुक्य वंश के राजधानी से जब सोमेश्वर अजमेर में अपना राजधानी बनाई तो उनके साथ उनके पत्नी कर्पूरी और दो पुत्र पृथ्वी और गोविन्द थे। पृथ्वी राज चौहान के अध्ययन अजमेर प्रसाद के विग्रह राज द्वारा स्थापित सरस्वती विद्या पीठ में युद्धकला और शास्त्र ज्ञान प्राप्त किए जो कि अभी “ढाई दिन की झोपड़ी “नाम से प्रसिद्ध है।
पृथ्वराज छः भाषाएं जानते थे और ओ धनुर्विद्या में  शब्दभेदी बान चलने में माहिर थे।

शासन व्यस्था --

पृथ्ीराज के राज्याभिषेक १५ साल के उम्र में हुआ था और उनकी माता उनका संरछिका थी।
पृथ्वराज के सात सेनापति थे -
पहला स्कन्द जो गुजरात राज्य के पंडित थे और ओ राज्य के दंडनायक भी थे।
दूसरा उदय राज , तीसरा उदग,कतिया, गोविन्द  और गोपाल सिंह चौहान।
मंत्री थे पंडित पद्वनाभ,प्रतापसिंह, रामदेव और सोमेश्वर

पृथ्वराज के सेना में अस्व सेना का महत्त्व अधिक था। पृथ्वी राज चौहान जब राजा बने तब उनके सेना में 70000 अश्व रोही थे। नारायन युद्ध में पृथ्वराज के सेना में दो लाख अश्व रोही सेना थी।

चालुक्य वंश की पराजय --

पृथ्वीराज के पिता सोमेश्वर के शासनकाल में चालुक्यवंशीय अजयपाल से सोमेश्वर ने अनेक कष्ट सहे थे। पृथ्वीराज की सेना ने रात्रिकाल में ही आबू प्रदेश पर आक्रमण कर दिया। परन्तु उस अभियान का नेतृत्व पृथ्वीराज नहीं कर रहे थे। क्योंकि पृथ्वीराज तो दिग्विजय अभियान के लिये भण्डानकप्रदेश और जेजाकभुक्तिप्रदेश में थे। मदनपुर से प्राप्त 1239 विक्रम संवत्सर में लिखित शिलालेख अपि इसकी पुष्टि करता है। खरतरगच्छपट्टावली के अनुसार पृथ्वीराज द्वारा 1239 विक्रम संवत्सर में (ई. 1162 वर्ष में) दिग्विजयाभियान आरम्भ करने के लिये नरायनक्षेत्र में अपनी सेना एकत्र की थी । पृथ्वीराज यदा जेजाकभुक्तिप्रदेश के विजयाभियान में थे, तब पृथ्वीराज को ध्यानच्युत करने के लिये चालुक्यवंशीय भीमदेवद्वितीय ने अजमेरु साम्राज्य के ऊपर आक्रमण किया था। उस आक्रमण में भीमदेव द्वितीय द्वारा सपादलक्ष साम्राज्य के लघु भूभाग पर आधिपत्य स्थापित किया गया था। चालुक्यवंशीयों के उस अभियान का नेतृत्व जगद्देव नामक अधिकारी ने किया था। परन्तु वो सफलता अति स्वल्पकालिन थी।

बीकानेर नगर के आग्नेयकोण में स्थित छापर ग्राम से 22 कि॰मी॰ दूर स्थित चारलूग्राम से जो दो शिलालेख प्राप्त हुए, उन शिलालेखों में नागौरयुद्ध का विवरण प्राप्त होता है। तत्र नागौर सङ्ग्राम में जो वीरगति को प्राप्त हुए, उनके स्मृतिचिह्न स्थापित किये गए हैं। खरतरगच्छपट्टावली के जैसे तत्रापि चौहान और चालुक्यवंश के सन्धि का उल्लेख मिलता है। उक्त तथ्यों के आधार से स्पष्ट है कि, चालुक्य के दो सेनापति जगद्देव और धारावर्ष को प्रारम्भिक काल में चौहान वंश के विरुद्ध सैन्य सफलता मिली और सपादलक्षसाम्राज्य के भूभाग पर आधिपत्य प्राप्त करने में वे दो सफल भी हुए। परन्तु उसके पश्चात् चौहान वंश के साथ हुए दीर्घकालीन युद्ध से सन्धि की स्थिति समुद्भूत हुई। खरतरगच्छपट्टावली में उल्लेख है कि, पृथ्वीराज के साथ दीर्घकालीनयुद्ध से सेनापति जगद्देव विपद्ग्रस्त हो गया था। अतः उसने पृथ्वीराज के साथ सन्धि कर ली थी। जगद्देव किसी भी प्रकार से पृथ्वीराज के साथ सन्धि-सातत्य चाहता था। जगद्देव की सन्धि से सम्बद्धित विवशता खरतरगच्छपट्टावली में वर्णित एक घटन से बहुधा ज्ञात हो सकती है।

पृथ्वराज और गौरी के बीच लड़ाई की वजह --

मोहम्मद गौरी ई. 1175 वर्ष में मुल्तान प्रदेश पर आधिपत्य प्रस्थापित कर उसी वर्ष उच्छ प्रदेश पर छल से आधिपत्य स्थापित कर चुका था। उसके पश्चात् ई. 1182 वर्ष में दक्षिण सिन्ध प्रदेश के ऊपर आक्रमण कर उसने सिन्धुप्रदेश पर स्वाधिपत्य स्थापित किया। उस से सपादलक्षसाम्राज्य की और गौरी द्वारा शासित सन्धुप्रदेश की सीमा समान हो गई। एवं गौरी पृथ्वीराज का प्रतिवेशी और शत्रु बन बैठा। उन दोनों के पास शत्रुता के अपने कारण भी थे। पृथ्वीराज अपने प्रदेश का सीमारक्षण करना चाहते थे, परन्तु उसके लिये तूर्क के आक्रान्ताओं को पीछे हटाना अनिवार्य था। दूसरी ओर गौरी की विस्तारवादि नीति के मार्ग में पृथ्वीराज कण्टक समान थे। क्योंकि भारत प्रदेश पर सत्ताविस्तार के लिये पृथ्वीराज का अन्त ही घोरी का लक्ष्य था ।
पृथ्वीराजविजय में उल्लेख मिलता है कि, पश्चिमोत्तर दिशा में जो अश्वों के लिये प्रसिद्ध प्रदेश हैं, उस प्रदेश का गौमांसभक्षी म्लेच्छ गौरी नामक राजा गर्जन देश में निवास करता है। तूर्क देशीय उस गौमांसभक्षण करने वाले के विषय में सुन कर पृथ्वीराज ने म्लेच्छों के नाश की प्रतिज्ञा ली। पृथ्वीराज द्वारा म्लेच्छनाश की जो प्रतिज्ञा की गई थी, उसके विषय में गौरी भी जानता थआ। अतः उसने ई. 1188 वर्ष में अजमेर दुर्ग में अपना दूत भेजा। उसके पश्चात् अजमेर की राज्यसभा में टकला (नारङ्गः) दूत उपस्थित हुआ। दूत के वचन सुनकर पृथ्वीराज की भीषण प्रतिक्रिया थी। अत्यन्त क्रोध से उच्च स्वर में पृथ्वीराज ने बोला, "मैं उसे (ग़ोरी) क्या बोलूं? वो निश्चय से जानता है कि, मैंने उसके सदृश नरभक्षक(विस्तारवाद से युद्ध होते हैं जिस में अनेक नर मरते हैं ये इङ्गित किया है) की हत्या करने के लिये ही विजयाभियान का आरम्भ किया है। ये जानकर भी वो मुझे, जिसे लोग "अजयमेरु का सिंह" ऐसा सम्बोधित करते हैं, उसको दूत भेजता है"। पृथ्वीराज के उक्त क्रोधपूर्ण वचन से घोरी के सन्देश का अनुमान ही कर सकते हैं। इतिहासविदों का मत है कि, उस काल में जैसी राजनैतिक स्थिति थी, उसके अनुगुण तो घोरी ने पृथ्वीराज को आत्मसमर्पण के लिये अथवा सन्धि के लिये सन्देश भेजा होगा। घोरी के दर्प से पूर्ण प्रस्ताव सुनकर पृथ्वीराज ने उस प्रस्ताव को अस्वीकार किया होगा, क्योंकि चौहान वंश का और पृथ्वीराज का स्वाभिमान से विपरीत सन्देश होगा ।
सतलज युद्ध --

सटलज का युद्ध पृथ्वीराज चव्हाण और मुहमद गौरी के साथ प्रथम युद्ध था।उस युद्ध में गौरी का घोर पराजय हुआ । न्यायपूर्ण शासन करते हुए राजा पृथ्वीराज एक बार राजसभा में बैठे थे। उसी समय चन्द्रराज नामक कोई राजा पृथ्वीराज के सम्मुख उपस्थित हुआ। वह चन्द्रराज पश्चिमदिशा के राजाओँ का प्रमुख था। वे राजागण भयभीत और निरुत्साहित थे। क्योंकि घोरी नाम यनवराजा अपने साम्राज्यविस्तार की नीति को पोषित करने के लिये अन्य प्रदेशों पर आक्रमण करता रहा था। उस यनवराजा से परास्त पश्चिमदिशा के सभी राजा पृथ्वीराज से सहायता की अपेक्षा रखते थे। पृथ्वीराज ने उनके लटके हुए मुख देख कर क्लेश का कारण पुछा। चन्द्रराज बोला, "हे राजन्! पश्चिमदिशा से घोरी नामक यवनराजा अन्य साम्राज्यों को पदाक्रान्त करते हुए अनेक राज्यों का सर्वनाश कर चुका है। उसने जिस राज्य पर आक्रमण किया, उस राज्य के सभी नगरों को लुट लिया गया और मन्दिरों को अग्निसात् कर दिया गया। राज्यों की स्त्रीओं बलात्कार किये गए, उसकी क्रूरता के कारण उन महिलाओं की स्थिति अति दयनीय हो चुकी है। वो जिस किसी भी राजपूत को सशस्त्र देखता है, उसे यमलोक भेज देता है। सद्यः घोरी (ग़ोरी) की राजधानी मुल्तान प्रदेश है।"

चन्द्रराज का वचन सुन कर पृथ्वीराज क्रोधि होकर खडे हुए और बोले,

    "मैं उस म्लेच्छ यवन को पराजित करके अपने चरणों में न नमा दूं तो, मैं चौहानवंशीय नहीं।"   
उसके पश्चात् पृथ्वीराज ने अति गर्व से अपने होथो से मुछो को सहलाया (titillate)। पश्चात् पृथ्वीराज ने चतुरङ्गिणी सेन के साथ मुल्तान प्रदेश पर आक्रमण कर दिया।वीकमपुर और उच्छ प्रदेश के मध्य में एक विशाल भूखण्ड में पृथ्वीराज का घोरी के साथ युद्ध हुआ थावह युद्ध ११८२-८३ (ई.) वर्ष में हुआ होगा। चूकि वह युद्ध सतलज नदी के तीर पर हुआ था, अतः उस युद्ध का नाम सतलजयुद्ध पड़ा। पृथ्वीराज की विशालसेना के आक्रमण से घोरी की सेना युद्ध से पलायन कर गई। पृथ्वीराज ने घोरी को बन्दी बना लिया। घोरी की दयनीय स्थिति हम्मीरमहाकाव्य में स्पष्टतया वर्णित नहीं है। परन्तु वहाँ उल्लिख है कि, पृथ्वीराज के सम्मुख नतमस्तक घोरी तबस्वतन्त्र हुआ, यदा उसने पृथ्वीराज को वार्षिककर देने का सङ्कल्प किया।


नरायन के प्रथम युद्ध में घोरी की पराजय --




1185से 1191 तक घोरी (ग़ोरी) द्वारा भारत के समीपवर्ति प्रदेशों में और भारतीयप्रदेशो में  बहुत आक्रमण किये। 1190 वर्ष में नरायन का प्रथम युद्ध हुआ था। उस युद्ध में घोरी की पराजय हुई तथा पृथ्वीराज ने घोरी को बंदी भी बनाया था।
घोरी ने 1190 वर्ष में प्रथम बार सुनियोजित रूप से सपादलक्ष साम्राज्य के ऊपर आक्रमण किया और उसने जीत लिया।पृथ्वीराज ने जब सरहिन्द के दुर्ग पर आक्रमण के समाचार पाए, तब वह अपने सामन्तों के साथ सरहिन्द प्रदेश की ओर बढ गये। पृथ्वीराज की सेना में 200000 अश्वोरोही और 3000  हाथी थे। पृथ्वीराज ने सरहिन्द प्रदेश की ओर विशालसेना के साथ यात्राम् आरम्भ कर दी है ये जब घोरी को ज्ञात हुआ, तब उसने भी विशाल सैन्यबल को साथ लेकर सरहिन्द प्रदेश की ओर यात्रा आरम्भ कर दी। सद्यः जो स्थल 'तरावडी' नाम से प्रसिद्ध है, वो स्थल तब नरायन था, उस क्षेत्र में दोनों सेनाओं के मध्य में भीषण युद्ध हुआ था। और इस युद्ध में घोरी बुरी तरह हार था।

तरायन की दूसरा युद्ध -

तराई का दूसरा युद्ध 1192 में हुआ । नरायन युद्ध के अनन्तर घोरी की मनःस्थिति अवसाद, क्लेश और आत्मग्लानि से युक्त थी। तबकाते नासिरी और तारिखे फरिश्ता इत्यादि ग्रन्थों में उल्लेख है कि, घोरी इतना दुःखी हो गया था कि, उसने अन्न और जल का भी त्याग कर दिया था। दिन और रात्रि वह अपने पराजय के दुःख की अग्नि में जलता रहता था। वह अपनी पत्नी के पास भी शयन नहीं करता था। तत्पश्चात् उसकी माता की प्रेरणा से घोरी पुनः युद्ध के लिये सज्ज हो गया। और इस तरह नारायन युद्ध या तराई का युद्ध हुआ।इस  युद्ध में पृथ्वराज चौहान के विरुद्ध बहुत सारे हिन्दू राजा ने घोरी के साथ मिल कर के जाल रचा और परिणाम ये हुआ कि पृथ्वीराज पराजित हुए और उन्हें घोरि बंदी बना लिया।उनको घोरि न बहुत शारीरिक यातना दिया और उनके आंख भी फोड़ दिया ।फिर बाद में गोरी और चनबरदाई ने मिल कर गोरी का वध कर दिए।


पृथ्ीराज का देहांत -

दिन पलटु-पलटु न मन, भुज वाहत सब शस्त्र।
अरि मिट मिटये न कोई, लिख्यु विधाता पत्र

अर्थात्, भाग्य ही बलवान् है। जीवन, मरण, दिन, रात्रि, सुख, दुःख, जय, पराजय, उत्थान और पतन नियति के अनुसार होते हैं।

घोरी पृथ्वीराज को बन्दी बना कर गझनी प्रदेश ले गया। चन्दबरदायी उस युद्ध में अनुपस्थित था, क्योंकि वह स्वयं पृथ्वीराज के आदेश से जम्मू में हाहुली हम्मीर नामक सामन्त के साथ सन्धि करने के लिये गया था। वहाँ हम्मीर नामक सामन्त ने चन्दबरदायी के परामर्श को अस्वीकार कर दिया और चन्दबरदायी को ही जालपा-देवी के मन्दिर में बिन्दी बना लिया। युद्ध के समाप्ति के पश्चात् चन्द मुक्तः हुआ। पृथ्वीराज पराजित हुए हैं और वें घोरी के बन्दी हैं ये समाचार चन्द को मिले। अतः वह अपने सम्राट् के उद्धार के लिये गझनी प्रदेश गया। वहाँ अपने वाक् चातुर्य से चन्द ने घोरी को प्रभावित किया।

तत्पश्चात् उनसे घोरी कहा कि, पृथ्वीराज अन्ध होते हुए भी कुशलतया लक्ष्य भेदने में समर्थ हैं। इस प्रकार घोरी को वो चमत्कार देखने के लिये प्रेरित किया। तत्पश्चात् चन्द वर्णन करते हैं कि, घोरी को पृथ्वीराज ने एक ही बाण से किस प्रकार मार दिया। घोरी के मरण के पश्चात् पृथ्वीराज और चन्द ने आत्मघात कर लिया। चन्द के अनुसार  उसकी और पृथ्वीराज की मृत्यु गझनी प्रदेश में हुई थी।मना जाता है कि पृथ्वीराज की देहांत 1192 में जब वो 25-26साल के थे तब हुआ था।


   पूजनीय पृथ्वराज चौहान हमारे दिलो और जिंदगी में
   हमेशा रहेंगे ।
                   

                Thanks for read

By jiut ray

Post Top Ad goggle

Your Ad Spot

My Website Pages